घाटशिला के पावड़ा मैदान में आयोजित बार माहारी (2 दिवसीय) माझी परगना महाल, धाड़ दिशोम के मारांङ सेनेलेद कार्यक्रम का रविवार को समापन हुआ। इस कार्यक्रम में आदिवासी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था, संवैधानिक अधिकारों तथा सामाजिक सशक्तिकरण जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर व्यापक चर्चा की गई। इस कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से आए पारंपरिक पदाधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी एवं समाज के प्रतिनिधियों ने भाग लिया और आदिवासी समाज की एकता, संरचना एवं अधिकारों को मजबूत करने के लिए अपने विचार साझा की।

कार्यक्रम के दौरान पोनोत जोग माझी शंकर सेन महाली ने विशेष रूप से भारत के संविधान तथा पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों से संबंधित महत्वपूर्ण प्रावधानों पर विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने संविधान के अंतर्गत आदिवासी क्षेत्र को प्राप्त अधिकारों को सरल भाषा में समझाते हुए बताया कि पंचम अनुसूची आदिवासी समुदाय के भूमि, जल, जंगल एवं संसाधनों की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण संवैधानिक व्यवस्था है। साथ ही उन्होंने प्रथम अनुसूची एवं पांचवीं अनुसूची के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए बताया कि जहां प्रथम अनुसूची राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के प्रशासनिक ढांचे से संबंधित है, वहीं पांचवी अनुसूची विशेष रूप से अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और संरक्षण से जुड़ी हुई है, जो पूरी तरह आदिवासी समुदाय के द्वारा प्रशासन और नियंत्रण करने का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज के सशक्तीकरण के लिए पेसा अधिनियम एवं उसकी नियमावली को जमीनी स्तर पर लागू करना अत्यंत आवश्यक है। पेसा कानून ग्राम सभा को निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है, जिससे स्थानीय संसाधनों, परंपराओं एवं सामाजिक व्यवस्था का संरक्षण संभव हो पाता है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि यदि ग्राम सभा को मजबूत किया जाए और उसे उसके संवैधानिक अधिकारों के प्रति जागरूक किया जाए, तो आदिवासी स्वशासन व्यवस्था को सशक्त एवं प्रभावी बनाया जा सकता है।कार्यक्रम में वक्ताओं ने यह भी कहा कि आज के समय में पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को आधुनिक ढांचे के साथ जोड़ते हुए समाज को संगठित करना आवश्यक है। ग्राम सभा को सशक्त बनाने का आह्वान कार्यक्रम के अंत में देश परगना बैजू मुर्मू ने अपने संबोधन में आदिवासी समाज की एकता पर विशेष बल देते हुए कहा कि स्वशासन व्यवस्था को मजबूत करने के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को संगठित होना आवश्यक है। उन्होंने ग्राम सभा को सशक्त बनाने का आह्वान करते हुए कहा कि यही आदिवासी स्वशासन की मूल आधारशिला है, और इसके माध्यम से ही समाज अपने अधिकारों की रक्षा एवं समग्र विकास सुनिश्चित कर सकता है। अंत में यह कार्यक्रम आदिवासी समाज के लिए जागरूकता, संगठन और अधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता का एक महत्वपूर्ण मंच साबित हुआ। उपस्थित सभी प्रतिभागियों ने संकल्प लिया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में जाकर संविधान में प्रदत्त अधिकारों, पेसा कानून तथा पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के प्रति समाज को जागरूक करेंगे और ग्राम सभा को सशक्त बनाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाएंगे। प्रस्ताव प्रस्तुत करने का कार्य दुर्गा चरण मुर्मू द्वारा किया गया, जबकि कार्यक्रम का सफल संचालन बिरेन टुडू ने किया। इस अवसर पर युवराज टुडू, जसाई मार्डी ( टीएसी सदस्य), सुकुमार सोरेन (समाज सेवी) तथा शंकर सेन महाली (आदिम महाली महाल) ने अपने महत्वपूर्ण विचार साझा किए। साथ ही सुशांत हेम्ब्रम (गोडेत, धाड़ दिशोम) एवं दीपक मुर्मू (माझी बाबा) ने भी पारंपरिक व्यवस्था और सामाजिक सशक्तिकरण पर अपने विचार रखे। कार्यक्रम में दुर्गा चरण मुर्मू (देश पारानिक, धाड़ दिशोम), पुन्ता मुर्मू, लक्ष्मी मार्डी, पार्बती मुर्मू, राम मार्डी संताली गायक सहित समाज के विभिन्न जिलों से आए लोग (माझी होपोन) उपस्थित थे।

रविवार शाम माझी परगना महाल के सम्मेलन में माझी परगना महाल के संस्थापक सदस्य सह घाटशिला के पूर्व विधायक कामरेड बास्ता सोरेन के पुत्र वधू समाजसेवी डॉ सुनीता देबदुत सोरेन ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि माझी परगना महाल केवल एक संगठन नहीं, बल्कि हमारी पहचान, हमारी परंपरा और हमारी ऐतिहासिक विरासत का प्रतीक है। इसे सहेजना, मजबूत करना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना हम सभी की साझा जिम्मेदारी है। हमारे पिताजी, घाटशिला के पूर्व विधायक कामरेड स्व बास्ता सोरेन, माझी परगना महाल के संस्थापक सदस्यों में से एक रहे हैं। उन्होंने हमेशा यह प्रयास किया कि आदिवासी समाज अपनी जड़ों से जुड़ा रहे, अपनी संस्कृति और परंपराओं को बचाए रखे और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बने।

माझी महाल की स्थापना का मूल उद्देश्य पारंपरिक व्यवस्था और सामूहिक निर्णय की शक्ति को मजबूत करना आधार रहा है। आज के समय में जब हमारी संस्कृति और पारंपरिक व्यवस्था पर कई तरह की चुनौतियां खड़ी हो रही हैं, तो ऐसे में माझी परगना महाल की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यह केवल सामाजिक संगठन नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व और अधिकारों की रक्षा का एक मजबूत आधार है।कार्यक्रम में वक्ताओं ने यह भी कहा कि आज के समय में पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था को आधुनिक संवैधानिक ढांचे के साथ जोड़ते हुए समाज को संगठित करना आवश्यक है।

बार माहारी मांराग सेनेलेद मांझी परगना महाल धाड़ दिसोम का समापन हो गया है!!

माझी परगना महाल की स्थापना का मुख्य लक्ष्य हमेशा से पारंपरिक शासन व्यवस्था को मजबूत करना और सामूहिक निर्णय लेने की क्षमता को बढ़ाना रहा है। आज के युग में जब हमारी संस्कृति, परंपराएं और पारंपरिक व्यवस्था पर अनेक चुनौतियां आ रही हैं, तब माझी परगना महाल की भूमिका और अधिक जरूरी हो गई है।

यह सिर्फ एक सामाजिक संगठन भर नहीं है, बल्कि हमारे समुदाय के अस्तित्व की रक्षा और हमारे अधिकारों को सुरक्षित रखने का एक मजबूत आधार है।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि वर्तमान समय में पारंपरिक स्वशासन प्रणाली को आधुनिक संवैधानिक ढांचे के साथ जोड़कर पूरे समाज को एकजुट और संगठित करना अत्यंत आवश्यक है।


प्रमुख उपलब्धियां

1️⃣संगठनात्मक मजबूती: माझी परगना महाल ने झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के संथाल क्षेत्रों में सक्रिय कार्य किया है। नियमित महासम्मेलन (जैसे घाटशिला में 2024 और आगामी 2026 सम्मेलन) आयोजित कर पारंपरिक स्वशासन को मजबूत करने, पिछले कार्यों की समीक्षा और भविष्य की रणनीति बनाई जा रही है। समाज को संगठित कर भूमि अधिकार, संस्कृति संरक्षण और सरना कोड जैसे मुद्दों पर सामूहिक आवाज उठाई गई है।

2️⃣प्रतिरोध और अधिकार रक्षा: जल-जंगल-जमीन से जुड़े मुद्दों (भूमि अधिग्रहण, फ्लोटिंग सोलर प्रोजेक्ट आदि) पर विरोध प्रदर्शन और आंदोलन किए गए। असम में संथालों पर अत्याचार के मामलों में राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग की गई। 22 सूत्री प्रस्ताव जारी कर सामाजिक-आर्थिक मांगें रखी गईं।

3️⃣आधुनिक ढांचे से जोड़ना: पारंपरिक मांझी-परगना व्यवस्था को PESA, ग्राम सभा और सरकारी योजनाओं के साथ जोड़ने के प्रयास किए गए। कुछ क्षेत्रों में सफलता मिली, पर पूर्ण एकीकरण अभी चुनौती है। शिक्षा, विकास और युवा जुड़ाव के कार्यक्रम भी चलाए गए।कुल मिलाकर प्रगति हो रही है, लेकिन चुनौतियां अभी भी बाकी हैं। यह काम लगातार चल रहा है।

सीमाएं और बाकी काम:

1️⃣पूरी तरह सफलता नहीं मिली क्योंकि आधुनिक कानूनी-प्रशासनिक व्यवस्था (पंचायती राज आदि) अक्सर पारंपरिक व्यवस्था को ओवरराइड कर देती है। कई जगहों पर संघर्ष जारी है।

2️⃣संस्कृति पर चुनौतियां (धर्मांतरण, शहरीकरण, विकास परियोजनाएं) बनी हुई हैं। संगठन इन्हें लगातार उठाता रहता है, लेकिन समाधान लंबी प्रक्रिया है।

3️⃣राजनीतिक दलों के साथ संबंध या आंतरिक मतभेद कभी-कभी प्रभावित करते हैं, फिर भी संगठन सक्रिय है।

कुल मिलाकर, विचारों को अमल में लाने के लिए निरंतर प्रयास हो रहे हैं - सम्मेलनों, प्रदर्शनों, मांग पत्रों और सामुदायिक संगठन के रूप में। लेकिन यह एक सतत प्रक्रिया है। हर महासम्मेलन में "पिछले कार्यों की समीक्षा" होती है, जो दिखाता है कि प्रगति हो रही है पर चुनौतियां भी हैं।