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सीएम हेमंत सोरेन ने लुगुबुरु में की पूजा- अर्चना, यहां से जुडी है संतालियों की जड़ें, इस पवित्र स्थान पर बना था संतालियों का ‘संविधान’ !

 

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन आज एक दिवसीय दौरे पर बोकारो पहुंचे. यहां पहुंचने के बाद सीएम हेमंत सोरेन ललपनिया के लुगुबुरु घांटाबाड़ी धोरामगाढ़ में सोहराय कुनामी (कार्तिक पूर्णिमा) पर वार्षिक पूजा-पाठ किये. इस दौरान सीएम ने कहा कि लुगुबुरु गहरी आस्था के केंद्र है. यहां देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं. अपनी सांस्कृतिक एवं पारंपरिक व्यवस्था को अक्षुण्ण रखने के संकल्प लेने लोग आते हैं और हर साल की तरह हमलोग इसबार भी आये हैं. लेकिन, कोरोना वायरस संक्रमण के कारण इस बार मेला एवं सम्मेलन आदि का आयोजन नहीं हो सका.




मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन हेलीपेड से सीधे दोरबार चट्टानी पहुंचे. समिति की संताली महिलाओं एवं बालिकाओं ने उन्हें पारंपरिक तरीके से पुनाय थान तक लाये. उनका लोटा-पानी से पारंपरिक स्वागत किया गया. मुख्यमंत्री श्री सोरेन ने यहां करीब 15 मिनट तक पूजा-अर्चना की. अपने आराध्य मरांग बुरु, लुगुबुरु, लुगू आयो, कपसा बाबा, बीरा गोसाईं, कुड़िकिन बुरु, घांटाबाड़ी गो बाबा की आराधना की और दूध, जल अर्पित करते हुए अगरबत्ती दिखाये. इसके बाद नारियल फोड़ा एवं मत्था टेककर राज्य की खुशहाली की कामना की.




दरबार चट्टानी पर लगातार 12 साल की बैठक के बाद तैयार हुआ था संतालियों का संविधान :
लाखों वर्ष पहले दरबार चट्टानी में लुगुबुरु की अध्यक्षता में 12 साल तक लगातार बैठक चली और उसके बाद संतालियों का संविधान अस्तित्व में आया. इस संविधान में संताली समाज के तमाम रीति-रिवाजों का वर्णन है. संताली समुदाय के जानकार बताते हैं कि इसी बैठक में संतालियों की गौरवशाली संस्कृति की रचना हुई.




इतने लंबे समय तक हुई बैठक के दौरान संतालियों ने इसी स्थान पर फसल उगायी और धान कूटने के लिए चट्टानों का प्रयोग किया. इसके चिह्न आज भी आधा दर्जन उखल के स्वरूप में यहां मौजूद हैं. इन लोगों ने बगल से बहने वाली पवित्र सीता नाला से पानी लाकर पेयजल के रूप में उसका इस्तेमाल किया. यह नाला जहां खत्म होता है, वहां करीब 40 फुट नीचे गिरता है. संताली समाज के लोग इसे सीता झरना कहते हैं.
सीता झरना को छरछरिया झरना के नाम से भी जाना जाता है. यूं कहें कि यह छरछरिया झरना के नाम से ज्यादा मशहूर है. इसके निकट एक गुफा है, जिसे संताली लुगुबाबा का छटका कहते हैं. मान्यता के अनुसार, लुगुबुरु यहीं स्नान करते थे और इसी गुफा के जरिये वे सात किमी ऊपर स्थित घिरी दोलान (गुफा) में आना-जाना करते थे. कहा जाता है कि लुगुबुरु के सच्चे भक्त इस गुफा के जरिये ऊपर गुफा तक पहुंच जाते थे.
संताली समाज के इतिहास और उनकी संस्कृति का अध्ययन करने वाले लोग बताते हैं कि चूंकि, इस स्थान पर लंबे समय तक बैठक हुई या लुगुबुरु का दरबार लगा. इसलिए यहां की चट्टानों को संतालियों ने दरबार चट्टानी कहा. दरबार चट्टानी स्थित पुनाय थान (मंदिर) में सबसे पहले मरांग बुरु और फिर लुगुबुरु, लुगु आयो, घांटाबाड़ी गो बाबा, कुड़ीकीन बुरु, कपसा बाबा, बीरा गोसाईं की पूजा की जाती है.



संतालियों के दशांय नृत्य (गुरु-चेला नृत्य) के दौरान गाये जाने वाले लोकगीत हों या विवाह, चाहे कोई भी छोटा-बड़ा अनुष्ठान ही क्यों न हो, हर अनुष्ठान में लुगुबुरु घांटा बाड़ी की अराधना व उपासना की जाती है. उनका बखान हर अवसर पर अनिवार्य रूप से किया जाता है.

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