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खरसावां गोलीकांड- आजाद भारत की शोर्यगाथा Chapter 1

आज मुझे खरसावां गोलीकांड शहीद स्थल पर जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।आप में से बहुत सारे लोग शायद् इस दर्दनाक घटना के बारे में नहीं जानते होगें,आईये आज आप सभी को आजाद भारत की पहला आंदोलन व शहादत दिवस के बारे में बताते है।


यह सुनकर अजीब नहीं लग रहा है कि भारत देश तो आजाद हो गया है,लेकिन यह कैसी आजादी कि लोग अपनी हक व अधिकारों को लेने के लिए आंदोलन और संघर्ष कर रहे हैं।
यह लेख आज इस घटना की कई परतों को उजागर करने का प्रयास करेगी।आप सभी जानते होगें कि कोल्हान दिशोम कभी गुलाम नहीं रहा था,ब्लकि आजादी के बाद से इस प्राकृतिक संसाधनों से भरपुर क्षेत्र का शोषण करने का षडयंत्र रचा गया।
 हजारों झारखंडियों के संघर्ष , शहादत और दमन की गाथा हैखरसावां गोलीकांड।आजाद भारत का एक ऐसा शोर्य गाथा जिसका इतिहास गुलाम भारत के "जालियांवाला कांड" से भी बड़ा है।आदिवासियों ने आजाद भारत का जश्न ठीक से मनाया ही था कि नव वर्ष के दिन एक दिल दहला देने वाली घटना घटी।इस बलिदान की गाथा को दिकु इतिहासकारों व लेखकों ने पक्षपातपूर्ण रवैये अपनाते अपने लेखों में एक इंच की स्थान भी नहीं दिया।
भारतीय संथाली सिने जगत के सितारें लखन सोरेन व राजुराज बिरुली एंव साथ में निर्माता सावन सोय

शायद भारतीय इतिहासकारो ने 01 जनवरी 1948 मे हुई  खरसावां गोलीकांड का जिक्र तक नही किया होगा । उस समय खरसावां एक रियासत हुआ करता था । खरसावां आदिवासी बहुल क्षेत्र था । तत्कालिक गृहमंत्री सरदार बल्ल्व भाई पटेल जिसने भारत के सभी प्रांतो को संघात्मक भारत का हिस्सा बनाना चाहते थे । उन्होने देशी रियासतों को तीन ग्रुप मे बांटा था । ये ग्रूप थे ए , बी , सी । ए श्रेणी मे भारत के बड़े रियासते थी । बी श्रेणी मे मध्यम तबके के रियासतें थी और सी श्रेणी मे छोटी रियासतें थी । खरसावां एक छोटी रियासत थी । उड़ीसा मे उड़ियाभाषा बोलने वालों की संख्या अधिक थी इस कारण खरसावां और सरायकेला रियासत को उड़ीसा मे विलय कर देना चाहते थे । उन दिनो इन रियासतों मे अलग झारखंड  राज्य का आंदोलन जोरो पर था । खरसावां और सरायकेला के आदिवासी उड़ीसा मे शामिल होना नही चाहते थे ।
 
हम जालियांवाला बाग की घटना को बचपन से पढ़ते आ रहे है जिसमे जालिम अंग्रेज जनरल डायर ने सैकडो भारतीयो की गोली मार कर हत्या कर दी गई थी । लेकिन बहुत कम भारतीय को ये पता होगा की आजाद भारत मे उड़ीसा मिलिट्री पुलिस द्वारा खरसावां रियासत के आदिवासियों की बेरहम तरीके से हत्या की वो भी इस लिए की वे लोग अलग आदिवासी राज्य की मांग कर रहे थे।
खरसावां गोलीकांड का स्माधि स्थल
वर्तमान झारखंड राज्य के जमशेदपुर शहर से लगभग 65 किलो मीटर दूर खरसावां मे 01 जनवरी 1948 को एक भयानक गोलीकांड हुआ था । ओड़िसा मिलिट्री पुलिस द्वारा खरसावां हाट मे लगभग पचास हजार आदिवासियों पर अंधाधुंध गोलीबारी की गई थी ताकि आदिवासी आंदोलनकारियो की अलग झारखंड  राज्य के आंदोलन को दबाया  जाए और खरसावां रियासत को ओड़िसा मे विलय कर दिया जाए ।


इस भयानक गोलीकांड का प्रमुख कारण था खरसावां रियासत को ओड़िसा राज्य मे विलय कर देना चाहते थे और स्थानीय आंदोलनकारियों को रोका जाए । उस समय समय बिहार के आदिवासी नही चाहते थे की खरसावां रियासत किसी भी कीमत मे ओड़िसा का हिस्सा नही बने । परन्तु सेंटर के दबाव मे मयूरभंज रियासत के साथ साथ सरायकेला रियासत और खरसावां रियासत का ओड़िसा मे विलय करने का समझौता हो चुका था । उन दिनो तीनो रियासतों के आदिवासी वृहद झारखंड  राज्य की मांग कर रहे थे । 01 जनवरी 1948 को सत्ता का हस्तांतरण भी होना था । उस समय अलग झारखंड राज्य की मांग करने वाले नेता जयपाल सिंह मुंडा इस आंदोलन के लीडर थे । उन्ही के आह्वान मे लगभग पचास हजार आदिवासी आंदोलनकारी खरसावां मे इक्कठे हो चुके थे । इस सभा मे हिस्सा लेने के लिए जमशेदपुर , राँची,सिमडेगा,खूंटी ,तमाड़,चाईबासा,और दूरदराज के इलाके से आदिवासी आंदोलनकारी अपने पारम्परिक हथियारो से लैस होकर खरसावां पहुँच चुके थे ।


इस आंदोलन से ओड़िसा सरकार चौकस थे । वह किसी भी कीमत मे खरसावां मे सभा नही होने देना चाहते थे । खरसावां हाट उस दिन ओड़िसा मिलिट्री पुलिस का छावनी बन गया था । खरसावां विलय के विरोध मे आदिवासी जमा हो चुके थे लेकिन किसी कारणवश जयपालसिंह मुंडा सभा मे नही आ पाए । खरसावां हाट मे भीड़ इक्कठा हो चुका था । 

जयपालसिंह मुंडा के नही आने पर भीड़ का धेर्य जवाब दे चुका था । कुछ आंदोलनकारी आक्रोशित भी थे । पुलिस किसी भी तरीके से भीड़ को रोकना चाहते थे । लेकिन अचानक से ओड़िसा मिलिट्री पुलिस ने भीड़ पर अंधाधुंध फायरिंग करना शुरू कर दिया । आदिवासी कटे पेड़ की तरह गिरने लगे । कोई तो ज़मीन मे लेट गए और कुछ पेड़ो के पीछे छुप कर अपनी जान बचाने लगे । खरसावां हाट के बीच एक कुँआ था पुलिस के जवानो ने कई लाशों को उठाकर कुँए मे फेक दिया । कुछ लाशों को ट्रकों मे लादकर पास के जंगलो मे फेक दिया गया । घटना के तुरंत बाद ओड़िसा सरकार ने सिर्फ पैतीस आदिवासियों की मारे जाने की पुष्टि की । लेकिन पीके देव की एक पुस्तक ‘ मेमायर ऑफ ए बाइगोर एरा’ (चेप्टर 6 पेज न .123) मे दो हजार से भी ज्यादा आदिवासियों के मारे जाने का जिक्र है । कोलकता से प्रकाशित अंग्रेजी दैनिक ‘ द स्टेट्समैन ‘ ने 03 जनवरी 1948 के एक अंक मे छापा ‘ 35 आदिवासीज किल्ड इन खरसावां ‘ । इस गोलीकांड का अभी तक कोई निश्चित दस्तावेज उपलब्ध नही है । इस गोलीकांड की जाँच के लिए ‘ ट्रिब्यूनल ‘ का गठन भी किया गया था पर आज तक उसकी रिपोर्ट कहाँ है किसी को नही पता ।
शहीद स्थल पर श्रध्दाजंलि अर्पित करते हुए लोगों का समूह
 इस भयानक गोलीकांड के बाद खरसावां हाट मे शहीद स्मारक बनाया गया । हरेक वर्ष 01 जनवरी को बड़ी संख्या मे झारखंडी इक्कठे होते है । खरसावां का यह शहीद स्मारक झारखंड के राजनीति का एक बड़ा केंद्र भी माना जाता है ।
                 खरसावां गोलीकांड हुए एक अरसा बीत गया । कई कमिटियां भी बनी , जाँच भी हुई परन्तु आज तक इस घटना पर कोई रिपोर्ट तक नही आया । जलियांवाला बाग कांड का असल विलन जनरल डायर को तो दुनियॉ जानती है लेकिन खरसावां गोलीकांड मे मारे गए हजारो झारखंडियों की हत्या करने वाला असली डायर कौन था, इस पर आज भी पर्दा पड़ा हुआ है ।

 यह घटना हमें कई बातों को सोचने पर विवश कर देती है व आंतरिक रूप से झकझोर देती है-
  क)खरसावां हाट मैदान में आयोजित आंदोलन सभा को नेतृत्व कर रहें मारांङ गोमके जयपाल सिंह मुण्डा के के नहीं आने के क्या कारण रहा होगा?
ख)अलग झारखंड राज्य की मांग खरसावां गोलीकांड के बाद तीव्र न होकर धीमी क्यों पड़ गई?
ग)आदिवासियों को हमेशा विस्थापित करने का प्रयास क्या जा रहा है?
संदर्भ : इस आलेख के सामग्री स्वयं लेखक के विचार पर आधारित है तथा अन्य स्त्रोतों से भी संकलित किए गए है।
यदि इसकी किसी के साथ समानता पायी जाती है तो इसे महज एक संयोग माना जाएगा,धन्यवाद।

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