आप सभी को हमारे ओर से झारखंडी हुल जोहार!
आज हम फिर से एक नए विचार व तथ्यों को लेके आपके सामने हाजिर है।कहा जाता है कि पुराने कहावत के अनुसार इतिहास अपने आप को दोहराता है,लेकिन यह इतिहास सिर्फ आदिवासियों के साथ ही क्यों दुहराता है?यह बात हमें सोचने को विवश कर देती है।
आज ही के दिन 2 जनवरी 2006 ओडिशा कलिंगनगर मे जबरन उद्योग बैठाने के विरोध प्रदर्शन में कई लोगों को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी।यह विरोध टाटा कंपनी के आदिवासियों के जमीन जबरन अधिग्रहण के कारण हुआ था।इक्कीसवीं सदी की यह एक दर्दनाक घटना है,आज भी आदिवासियों के प्रति बाहरियों का शोषण बंद नहीं हुआ है।आदिवासियों के लिए जल,जंगल व जमीन ही सबकुछ होता है।इसी से वे अपने दैनिक जीवन-यापन करते है।भारत बहुत सारी कंपनियां स्थापित हुई,जिसमें देखा गया कि इससे आदिवासियों का विकास तो नहीं हो पाया,उल्टा वे विस्थापित हो गए है।इसी परिणाम को देखते हुए आदिवासी टाटा कंपनी के जमीन अधिग्रहण का विरोध कर रहे थे।इन कंपनी के के बाहरी लोगों को यहां घुसपैठ करने का मौका मिल रहा है।
यह सवाल मन में हमेशा कौंधता है कि आदिवासी सिर्फ मातम व दुःख मनाने के लिए ही है क्या?उनके संघर्ष व बलिदान को इतना नजरअंदाज क्यों किया गया।आज हमें अपना इतिहास स्वयं ढुंढना होगा,हमें स्वयं इसकी खोज करनी होगी।हमारे लिए कोई और क्यों लिखेगा।आज यदि हमें अपना अस्तित्व बचाना है तो सिर्फ ताकत से नहीं ब्लकि दिल वदिमाग से जीतना होगा।आज शारीरिक ताकत से कलम की ताकत महत्वपुर्ण हो गया है।
अब समय बदल चुका है दोस्तों,सिर्फ फेसबुक व सेल्फी लेने में ही व्यस्त रहोगें तो आप अपना अस्तित्व नहीं बचा पाओगे।
आजादी के बाद तो लोग शांति व चैन की नींद लेते है,लेकिन आदिवासी आज भी अपने जमीन,घर व अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा है।यह कैसी आजादी है?आज तो हमारे देश में विदेशी व अंग्रेज भी नहीं है,तो फिर यह अन्याय हमारे आदिवासियों पर कौन कर रहा है।आज हमें अपने समाज के दुश्मनों को पहचानना होगा।हमारे समाज में जयचंद जैसे लोग भी भरे पड़े है,उनसे भी सावधान रहना होगा।
नमन है हमारे आदिवासी उन भाइयों पर जब भी दुनिया के लोगों को खुशी नसीब होती है तब हम आदिवासी अपनी जमीन से बेदखल कर शहीद हो जाते हैं,हमारे पुरखों की समाधि पर लोग खुशी मनाते हैं पर हम आदिवासी अपनी पुरखों की याद कर मातम मनाते हैं।
यही बिडम्बना है,कि आदिवासियों पर हुये दमन और अत्याचार को हमेशा दबाया या छुपाया गया है । जिस तरह सराईकेला खरसावाँ का detail explanation नहीं मिलेगा ठीक उसी तरह और भी इस शताब्दी में दर्जनों firing series हुए । हमें इसकी खोजबीन करनी पड़ेगी । कहीं-कहीं चिट-पुट वर्णन मिलेगा उसे ही हमें document करना पड़ेगा ।
१. १ जनवरी १८३८ (जगन्नाथपुर शहादत दिवस) ।
पोटो सरदार, नारा और बड़ाय को फांसी दिया गया था ।
१ जनवरी १९४८ खरसावाँ गोली कांड ।
२. २ जनवरी १८३८ सिरूंग साई (सेरेंगसिया) शहीद दिवस ।
२ जनवरी २००६ कलिंगा नगर शहादत दिवस (कलिंगा नगर गोली कांड) ।
३. ३० जनवरी १९४८ उड़ीसा पुलिस firing तिरिंग और देवपोसी में भी बहुत संख्या में आदिवासी शहिद हुए ।
४. ६ जनवरी १९७८ (ईचा: गुटु firing).
७ अक्टूबर १९७८ (Kashijhore firing).
५. २५ नबम्बर १९७८ (Surrenda firing).
६. ८ सितम्बर १९८० (Gua firing).
७. २४ नवम्बर १९८० (Baipih goli firing).
८. ४ अप्रेल १९८१ (Illigada firing).
९. २५ अप्रेल १९८१ (Tonto firing).
१०. २६ अक्तूबर १९८१ (Kuira firing).
११. ५ नवम्बर १९८१ (Kumbia firing).
१२. १४ नवम्बर १९८१ (Jojo hatu firing).
१३. २५ नवम्बर १९८१ (Sarjom hatu firing).
१४. २१ अक्तूबर (Chandil firing).
इन firing series में केवल आदिवासी ही नहीं, हमारे साथ बरसों से रह रहे महतो , कुड़मी, गोप etc. थे । लेकिन १ जनवरी का सराइकेला खरसावाँ firing बहुत ही भयावह था । कहते हैं जालियावाला हत्या काण्ड से भी भयावह जिसमें १०,००० से भी ज्यादा लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था । जिसमें बच्चे, औरत, बुढ़े, जवान सभी शामिल थे ।
आज से १७६ साल पहले १९३७ में हमारे हो लोगों ने अंग्रेजों के साथ बहुत भयानक संघर्ष किये काफी लोगों की जानें चली गई । दिसम्बर आते-आते कई हो लोगों (योद्धाओं) को पकड़ लिया गया और १ जनवरी १८३८ को पोटो सरदार और बढ़ाए को अंग्रेजों ने फांसी दे दिया और उनके जीवन का अंत हो गया । उनका सपना पूरा नहीं हो सका कि उनके रहते हुए पूरा कोलहान अंग्रेजों के चंगुल से अजाद रहेगा । उन लोगों का अत्याचार को उनके जीते जी खतम कर देंगे पर ऐसा नहीं हो सका और १ जनवरी को उनका सपना-सपना ही रह गया ।
फिर आज से ठीक ६७ साल पहले १ जनवरी १९४८ को खरसावाँ (सराइकेला) में हजारों हो लोगों पर एैसी गोलियाँ चलाई गई कि एैसा लग रहा था मानो गोलियों की बारिश हो रही है । यह आज तक किसी को नहीं पता इसमें कितने हजार हो लोग मारे गये थे ।
आज भी एैसे कई लोग मिलेंगे जो १९४८ के गोली काण्ड के बाद हुई असंख्य शहीद हुये लोगों को जमीन पर पड़े देखे हैं । वहाँ पास में ही एक कुआँ था जिसमें लाशों को भर कर उपर से मिट्टी डाल कर बन्द कर दिया गया ।
आज भी मैं एसे लोगों को जानता हूँ जो १ जनवरी को new date में प्रवेश कर कोई खुशी नहीं मनाते । उन लोगों का मानना है कि जिस दिन समाज के हजारों लोग शहीद हो गये उस दिन समाज भला कैसे खुशी मना सकता है ???
जैसे America में ११ सितम्बर को हमला हुआ तो काफी लोग मारे गये क्या वो लोग उस दिन खुशी मनाते हैं ???
आज अगर 'हो' का अस्तित्व कोलहान में है तो उसी शहादत के बदौलत है । उनके बलिदान को 'हो' समाज के हरेक पीढ़ी याद रखेगी ।
इतना याद रखिए कि उन्हीं शहीदों की शहादतें खून की तरह हमारी रगो में भी में दौड़ रही है ।हमें उसका कर्ज भी चुकाना है।आप सभी आदिवासी भाई-बहनों से निवेदन है कि अच्छे से शिक्षा ग्रहण कीजिए और अपने समाज को आगे बढ़ाये।
संदर्भ : इस आलेख के सामग्री स्वयं लेखक के विचार पर आधारित है तथा अन्य स्त्रोतों से भी संकलित किए गए है।
यदि इसकी किसी के साथ समानता पायी जाती है तो इसे महज एक संयोग माना जाएगा,धन्यवाद।
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