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पद्मश्री प्रो. दिगम्बर हांसदा का निधन,आदिवासी समाज में शोक की लहर!

#दुखद : पद्मश्री प्रो. दिगम्बर हांसदा का निधन,आदिवासी साहित्य जगत के लिए अपूर्ण क्षति एवं आदिवासी समाज को एक मार्गदर्शक व अभिभावक की कमी हमेशा खलेगी,आदिवासी समाज में शोक की लहर!

सरना टुडे, जमशेदपुर : राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने 26 जनवरी 2018 को भारत के 69 वें गणतंत्र दिवस पर, प्रोफेसर दिगंबर हांसदा को साहित्य और शिक्षा क्षेत्र के लिए भारत पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया गया है।दिगंबर हांसदा हांसदा ने करनडीह स्थित एलबीएसएम कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में भी कार्य किया।

16 अक्टूबर 1939 को पूर्वी सिंहभूम जिला स्थित मानगो ब्लाॅक के डोभापानी (बेको) में जन्मे स्व. हांसदा करनडीह के सारजोमटोला में रहते थे। उनकी प्राथमिक शिक्षा राजदोहा मिडिल स्कूल से हुई थी, जबकि उन्होंने मैट्रिक बोर्ड की परीक्षा मानपुर हाईस्कूल से दी थी। उन्होंने 1963 में रांची यूनिवर्सिटी से राजनीति विज्ञान में स्नातक और 1965 में एमए किया। वे लंबे समय तक करनडीह स्थित एलबीएसएम कालेज में शिक्षक रहते हुए टिस्को आदिवासी वेलफेयर सोसाइटी और भारत सेवाश्रम संघ, सोनारी से भी जुड़े रहे। इनकी पत्नी पार्वती हांसदा का स्वर्गवास पहले ही हो चुका है। ये अपने पीछे दो पुत्र पूरन व कुंवर और दो पुत्री सरोजनी व मयोना समेत भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। इनकी एक पुत्री तुलसी का भी निधन हो चुका है।
                             अंतिम दर्शन के लिए लोगों का तांता लगा

प्रो. दिगम्बर हांसदा ने अपना जीवन संताली साहित्य के प्रचार और आदिवासी युवाओं के बीच शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया है, लेकिन उन्हें लगता है कि अभी भी उनके पास बहुत काम है। "मैं खुश हूं लेकिन यह अंत नहीं है। ऐसा करने के लिए बहुत कुछ है। मुझे अभी भी लगता है कि आदिवासी युवाओं को शिक्षा के महत्व को समझने की जरूरत है," उन्होंने कहा।उनका यह विचार आदिवासी समाज को हमेशा याद आएगी। 

दिगंबर हांसदा ने अपनी माध्यमिक शिक्षा पोटका ब्लॉक के मानपुर हाई स्कूल से पूरी की और इसके बाद रांची विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर किया।  उन्होंने टिस्को आदिवासी सहकारी समिति के लिए काम किया, जो शुरुआती 1960 के दौरान कल्याणकारी गतिविधियों में लगी हुई थी। 
उन्होंने इस्पात शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल स्थापित करने और कॉलेजों में जनजातीय भाषाओं को शुरू करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
दिगंबर हांसदा हांसदा ने करनडीह स्थित एलबीएसएम कॉलेज के प्रिंसिपल के रूप में भी कार्य किया।
प्रो. हांसदा का जनजातीय और उनकी भाषा के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान है। वे केंद्र सरकार के जनजातीय अनुसंधान संस्थान व साहित्य अकादमी के भी सदस्य रहे। इन्होंने कई पाठ्य पुस्तकों का देवनागरी से संथाली में अनुवाद किया था। उन्होंने इंटरमीडिएट, स्नातक और स्नातकोत्तर के लिए संताली भाषा का कोर्स बनाया। भारतीय संविधान का संताली भाषा की ओलचिकि लिपि में अनुवाद किया था।

अन्तराष्ट्रीय संताल परिषद के संस्थापक अध्यक्ष एवं TAC के पूर्व सदस्य भी रह चुके हैं।प्रो. दिगम्बर हांसदा कोल्हान विश्वविद्यालय के सिंडिकेट सदस्य भी रहे।  वर्ष 2017 में दिगंबर हांसदा आईआईएम बोधगया की प्रबंध समिति के सदस्य बनाए गए थे। प्रो. हांसदा ज्ञानपीठ पुरस्कार चयन समिति (संताली भाषा) के सदस्य रहे हैँ, सेंट्रल इंस्टीच्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वैज मैसूर, ईस्टर्न लैंग्वैज सेंटर भुवनेश्वर में संथाली साहित्य के अनुवादक, आदिवासी वेलफेयर सोसाइटी जमशेदपुर, दिशोम जोहारथन कमेटी जमशेदपुर एवं आदिवासी वेलफेयर ट्रस्ट जमशेदपुर के अध्यक्ष रहे, जिला साक्षरता समिति पूर्वी सिंहभूम एवं संथाली साहित्य सिलेबस कमेटी, यूपीएससी नयी दिल्ली और जेपीएससी झारखंड के सदस्य रह चुके हैं। दिगंबर हांसदा ने आदिवासियों के सामाजिक व आर्थिक उत्थान के लिए पश्चिम बंगाल व ओडिशा में भी काम किया।
विडियो लिंक:-
https://youtu.be/XjcMo5UItA4
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