डीलिस्टिंग के कारण आदिवासी का संख्याबल खतरे में?
क्या अपने वास्तविक धर्म में घर वापसी ही बचा सकती हैं?
आज के समय में जिस समुदाय में एकता व जागरुकता रहेगी, वही भविष्य में आर्थिक, सामाजिक व बौद्धिक रूप से मजबूत होकर आगे बढ़ेगा तथा जीवनयापन के विभिन्न आयाम स्थापित करेगा.
आज आदिवासी समाज विभिन्न धार्मिक, राजनीतिक गुटों में बंट चुका हैं, यह चिंता का विषय हैं. अपना वास्तविक धर्म को छोड़कर अन्य धर्म को अपना रहे हैं.
ऐसे में वास्तविक आदिवासी धर्म कैसे बचेगा. अन्य धर्म में परिवर्तित आदिवासी भारतीय संविधान का अनुच्छेद के आड़ में कि " भारतीय नागरिक स्वेच्छापूर्वक कोई भी धर्म का पालन कर सकता हैं " , अपने धार्मिक समुदाय के संख्याबल को कमजोर कर रहे हैं. इसमें शिक्षित आदिवासी की भूमिका ज्यादा देखने को मिल रही हैं.
थोड़ा क्या पढ़ लिख लिया अपने को अन्य आदिवासी भाई-बहनों से श्रेष्ठ समझने लगते हैं. जितने लोग जीवन में आगे बढ़ रहे हैं, उनका दायित्व हैं कि अपने समाज के लोगों का मार्गदर्शन करना.
डीलिस्टिंग से वास्तविक आदिवासियों की पहचान तो होगी ही तथा ईसाई बने आदिवासियों को दोहरा लाभ मिलना बंद हो जाएगा. लेकिन इसका दूसरा पहलू यह हैं कि डीलिस्टिंग के कारण वास्तविक आदिवासियों की संख्या घट जाएगी तथा आरक्षित सीटों की संख्या भी घट जाएगी, जिससे आदिवासियों का प्रतिनिधित्व राजनीति में घट जाएगा. हर सिक्के के दो पहलू होते हैं.
इससे बचने का एक ही उपाय हैं , जितने भी आदिवासी समुदाय है वापस अपने मूल धर्म में घर वापसी करें, नहीं तो खत्म होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा. वास्तविक आदिवासी और धर्म परिवर्तित आदिवासी दोनों के लिए डीलिस्टिंग का कानून बहूत बड़ा खतरा हैं.
आदिवासी समुदाय जीवनयापन के लिए गांव में निवास करने वाले केवल कृषि तथा शिक्षित आदिवासी केवल नौकरी के भरोसे ही बैठे होते है. आज क समय में रोजगार के अन्य साधनों अथवा व्यवसाय पर भी विचार करने चाहिए. आज जनसंख्या बहूत तेजी से बढ़ रही हैं.
रोजगार के अवसर सीमित होते जा रहीं. हर छह माह में नवीनतम टेक्नोलॉजी में बदलाव हो रहे हैं. वर्तमान समय के साथ चलना होगा, नहीं तो विलुप्त होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा.
आज के समय में देखा जा रहा है कि शिक्षित आदिवासियों के घर में अपने मातृभाषा में संवाद की कमी देखने को मिल रही हैं. अपने मातृभाषा के स्थान पर अन्य भाषा का इस्तेमाल कर रहें. इससे आने वाले समय में कई आदिवासी भाषा विलुप्त के श्रेणी में आने वाले हैं.
अभी आदिवासी समुदायों में सरना धर्म कोड या आदिवासी धर्म कोड को लेकर संशय की स्थिति बनी हुई हैं. एक पक्ष सरना धर्म कोड के लिए आंदोलन कर रहें और एक पक्ष आदिवासी धर्म कोड के लिए आंदोलन कर रहे हैं. सरना धर्म कोड के पक्षधर अधिकतर प्रकृति पूजन करने वाले लोग हैं, जबकि आदिवासी धर्म कोड में बहुरूपिए अपना बचाव कर रहे हैं. सरना धर्म कोड ही बेहतर विकल्प है आदिवासी समुदायों के लिए. पश्चिम बंगाल के आदिवासी समुदाय सरी सरना धर्म की मांग कर रहा हैं. आदिवासियों के धार्मिक मांग में एकरुपता की कमी हैं.
अंतर्जातीय विवाह नहीं हना चाहिए, इससे आरक्षण में प्रतिनिधित्व का आंकड़ा प्रभावित होता हैं. यह आदिवासी पुरुष व महिला दोनों के ऊपर समान रूप से लागु होता हैं.
अभी सभी आदिवासी समुदायों को एकजुट होना होगा. एकजुट होने में माझी बाबा/ग्राम प्रधान/पाहान/मुंडा/मानकी की अहम भूमिका होगी. पद के आधार पर कार्यों में भी सक्रिय भूमिका होनी चाहिए. युवाओं को सहयोग के लिए आगे आना होगा.

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