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झारखंड के महान शिक्षाविद, साहित्यकार और एल. बी. एस. एम. महाविद्यालय करनडीह, जमशेदपुर के पूर्व प्रोफेसर कारू मांझी का निधन से शिक्षा जगत में अपूरणीय क्षति !

 

प्रो. कारू मांझी 

झारखंड के महान शिक्षाविद, साहित्यकार और एल. बी. एस. एम. महाविद्यालय करनडीह, जमशेदपुर  के पूर्व प्रोफेसर , आदिवासी कल्याण छात्रावास करनडीह, जमशेदपुर के पूर्व अधीक्षक एवं कोल्हान विश्वविद्यालय चाईबासा में कार्यरत आदिवासी क्षेत्रीय भाषा (TRL) के HOD प्रोफेसर कारू मांझी अब हमारे बीच नहीं रहे। झारखंड के शिक्षा जगत एवं समाज के लिए यह बहुत बड़ी क्षति है।

प्रोफ़ेसर कारू माझी का देहांत 6 दिसंबर 2020 को रात्रि 1 बजे टीएमएच जमशेदपुर में हुआ. वह 63 वर्ष के थे. प्रो. कारू मांझी का जन्म 6 जून 1957 को झारखंड पूर्वी सिंहभूम जिला के पोटका विधानसभा क्षेत्र फुलझुरी गांव में हुआ, उनका गोत्र संथाल समाज के किस्कू था.उनके पिता का नाम छोटा कासू किस्कू और माता का नाम टूसु मुर्मू किस्कू है.

प्रोफ़ेसर कारू मांझी मानपुर उच्च विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा 1977 में उत्तीर्ण की. उच्च शिक्षा प्राप्त हेतु लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय, करनडीह जमशेदपुर से 1982 ई. में बी. कॉम की परीक्षा एवं रांची विश्वविद्यालय से संताली में M.A 1985 ई. में किया. उनकी उच्च शिक्षा प्राप्त के बाद उन्हें लाल बहादुर शास्त्री करनडीह जमशेदपुर का संताली विभाग का प्रोफेसर रहे.वर्ष 2015 से कोल्हान विश्वविद्यालय के TRL संताली विभाग का एच.ओ.डी. रहे। प्रो. कारू मांझी का छोटे से ही समाज के प्रति अत्यंत प्रेम था.

उनके द्वारा लिखी गई संताली किताब " मिद् गांडो मिद् माची " उसके साथ-साथ और भी संताली किताबों की रचना प्रोफ़ेसर कारू मांझी ने की है. प्रो. कारू मांझी International Santal Council , All India Santal Intellectual Forum के साथ-साथ कोल्हान विश्वविद्यालय के सीनेट मेंबर भी मनोनीत किए गए थे.प्रोफ़ेसर कारू माझी का देहांत पूरे कोल्हान के लिए अत्यंत अपूरणीय क्षति है. आदिवासी समाज उनके योगदानों के लिए हमेशा याद रखेगा। 

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